THE KOLKATA SHADOWS | अध्याय 1: मानसून हत्या
ढाबे की टिन की छत पर बारिश गोलियों की तरह बरस रही थी, हर बूँद गरम तेल में प्याज़ के चटकने की आवाज़ से भी तेज़ थी। इंस्पेक्टर विक्रम चौहान अपनी स्टील की थाली पर झुके बैठे थे, बड़ी कुशलता से नान का एक टुकड़ा तोड़कर उसे गाढ़ी, नारंगी रंग की बटर चिकन ग्रेवी में डुबो रहे थे। ढाबे के मालिक रमेश भाई जानते थे कि ऐसे समय में उन्हें परेशान करना ठीक नहीं है। इंस्पेक्टर हर मंगलवार शाम को यहीं आते थे, उसी कोने वाली मेज पर, वही ऑर्डर देते थे, बर्तनों की खड़खड़ाहट और लोगों की बातचीत के शोर में एकांत की तलाश में। विक्रम के फोन पर तीसरी बार घंटी बजी। उसने पिछली दो कॉलों की तरह इसे भी नज़रअंदाज़ कर दिया। बयालीस साल की उम्र में उसे समझ आ गया था कि आपातकालीन स्थिति में कम से कम पांच मिनट और इंतज़ार किया जा सकता है—कम से कम खाना खत्म होने तक। कोलकाता पुलिस विभाग एक रात के खाने के दौरान उसके बिना भी चल सकता था। कम से कम उसे ऐसा ही लगता था। "सर, कृपया, यह बहुत ज़रूरी है!" यह आवाज़ कांस्टेबल रोहित मल्होत्रा की थी, जो प्रवेश द्वार पर सिर से पैर तक भीगा खड़ा था, उसके जूतों के आसपास पानी जमा था। उसके …